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हैप्पी बर्थडे सौरव गांगुली: मैच फिक्सिंग के काले दौर से विश्व क्रिकेट की ताकत बनने तक ‘दादा’ की कहानी

सबने सौरव गांगुली ‘दादा’ की कप्‍तानी में आक्रमकता, जीतने का जज्‍़बा और अंत तक लड़ते रहने का जुझारूपन देखा।
  • 8 जुलाई को होता है दादाका जन्‍मदिन
  • बूरे दौर में ली थी कप्‍तानी की कमान

सौरव गांगुली- भारतीय क्रिकेट की नई सोच

सौरव गांगुली ‘दादा’ ये उस महान क्रिकेटर का नाम है, जिसने ना सिर्फ़ क्रि‍केट में बड़े-बड़े रिकॉर्ड बनाए, बल्‍कि ये वो नाम है, जिसने अपनी कप्‍तानी में भारतीय क्रिकेट की सूरत ही बदल दी। 90 के दौर में एक समय ऐसा भी आया था, जब भारत को कमजोर टीमों में आंका जाने लगा था। वो दौर था, जब सलामी बल्‍लेबाज सचिन तेंदुलकर और सौरव गांगुली के ऊपर सारा दारोमदार रहता था। अगर इनमें से कोई एक चल गया, तो भारत की पकड़ मैच में मजबूत रहती है, नहीं तो पूरी टीम रन बनाने के लिए जूझती रहती थी। यही नहीं 200 के ऊपर रन चेज़ करना भी उस दौर में भारत के लिए काफ़ी मुश्‍़कि़ल होता था और विदेशी धरती पर जीतने की बात तो छोड़ ही दीजिए। ऐसा माना जाता था, कि भारत का विदेशी दौरा मतलब हार निश्‍चित है। ऐसा नहीं था, कि भारत जीतती नहीं थी, लेकिन ऐसे मौक़े बहुत कम देखने को मिलते थे।  

वो बुरा दौर जब ‘दादा’ ने संभाली भारत की कमान

वर्ष 2000 में मैच फ‍़‍िक्‍सिंग के आरोपों ने भारतीय टीम को हिला कर रख दिया था, जिसमें मोहम्‍मद अज़हरुद्दीन, अजय जडेजा और नयन मोंगिया जैसे बड़े नाम शामिल थे। इसके बाद टीम में बिखराव की स्‍थि‍ति पैदा हुई। यहां तक की अब यह सोचा जाने लगा, कि भारतीय क्रिकेट के भविष्‍य का क्‍या होग? किसके हाथों में टीम की बागडोर सौंपी जाए और तभी सौरव गांगुली को पूर्ण रूप से केन्‍या में खेले जाने वाले ICC नॉक आउट ट्रॉफ़ी के लिए कप्‍तान चुना गया। इस टीम में बड़े-बड़े खिलाड़ी नदारद थे, लेकिन ‘दादा’ कुछ और ही सोच रहे थे। उस ICC टूर्नामेंट में सौरव गांगुली कुछ नए खि‍लाड़‍ियों को अपने साथ ले गए, जिसमें युवराज सिंह का भी नाम था, जो आगे चलकर भारत के कितने बड़े खि‍लाड़ी बने यह पूरा विश्‍व जानता है।

मैच फ़‍िक्‍सिंग का काला दौर, जिसमें शामिल थे बड़े नाम  

वर्ष 2000 में दक्षिण अफ्रीका टेस्‍ट और वन-डे खेलने के लिए भारत का दौरा करती है। सीरीज़ के बाद भारतीय क्रिकेट में मैच फ़‍िक्‍सिंग की ख़बर जोर पकड़ लेती है, जिसमें बड़े-बड़े दिग्‍गज खिलाड़‍ियों के नाम सामने आते हैं। इस सीरीज़ में ‘दादा’ ने वन-डे सीरीज़ की कप्‍तानी की थी। मैच फ़‍िक्‍सिंग की लिस्‍ट में मोहम्‍मद अज़हरुद्दीन, अजय जडेजा, नयन मोंगिया और मनोज प्रभाकर जैसे नाम थे। इसके बाद मामले को CBI को सौंप दिया गया। CBI जांच के बाद सामने आए तथ्‍यों के बाद BCCI ने मोहम्‍मद अज़हरुद्दीन पर आजीवन बैन और अजय जडेजा पर 5 साल का प्रतिंबध लगा दिया गया। इसके बाद भारतीय क्र‍िकेट में खाई पैदा हुई, जिसे सौरव गांगुली ने अपनी कप्‍तानी की कला, आक्रमकता और जुझारूपन के चलते टीम को उस फ़‍िक्‍सिंग के काले दौर से बाहर निकालने का काम किया।

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ICC नॉक आउट 2000 (नैरोबी, केन्‍या)   

भारत पहली बार नए कप्‍तान के साथ ICC टूर्नामेंट खेलने पहुंचा, जिसके पास कई चुनौतियां थी। टीम बड़े खि‍लाड़‍ियों के बिना नैरोबी पहुंची और गांगुली को कप्‍तानी का इतना अनुभव नहीं था। अच्‍छी बात यह थी, कि सचिन तेंदुलकर जैसा बड़ा नाम और ख़‍िलाड़ी टीम में मौजूद था। साथ अनिल कुंबले, रॉबिन सिंह और वेंकटेश प्रसाद जैसे अनुभवी खि‍लाड़ी थे। इसके अलावा युवराज सिंह और ज़हीर खान जैसे डेब्‍यू करने वाले नए खि‍लाड़ी भी थे, जिन्‍होंने आगे चलकर भारतीय टीम के बड़े मैच विनर बने।

सबसे बेहतरीन कप्‍तान बनकर उभरे सौरव गांगुली

इस ICC नॉक आउट में दुनिया के सामने भारत की छवि को बदलकर रख दिया। साथ ही ‘दादा’ की कप्‍तानी में भारत ऑस्‍ट्रेलिया और दक्षि‍ण अफ्रीका जैसी बड़ी टीम को हराकर फ़ाइनल में पहुंची, लेकिन दुर्भाग्‍य से वो न्‍यूज़ीलैंड से फ़ाइनल हार गई। उस दौर में भारत का ICC जैसे टूर्नामेंट में फ़ाइनल तक पहुंचना यह बताता है, कि भारत आगे विश्‍व क्रिकेट पर राज करने वाला था। कप्‍तान के तौर पर सौरव गांगुली का परफ़ॉर्मेंस इस नॉक आउट में लाजवाब रहा। उन्‍होंने सेमीफ़ाइनल में दक्षिण अफ्रीका के ख़‍िलाफ़ नाबाद 141 रन बनाए, वहीं फ़ाइनल में न्‍यूज़ीलैंड के खिलाफ़ 115 रन की पारी खेली थी। सबने ‘दादा’ की कप्‍तानी में आक्रमकता, जीतने का जज्‍़बा और अंत तक लड़ते रहने का जुझारूपन देखा।

इतिहास में दर्ज है 2001 की बॉर्डर-गावस्‍कर श्रृंखला

कौन भूल सकता है सौरव गांगुली की कप्‍तानी में साल 2001 की बॉर्डर-गावस्‍कर श्रृंखला, जहां भारत ने सिर्फ़ चमत्‍कार ही नहीं किया, बल्‍कि बता दिया, कि अब वह विष्‍व की बड़ी टीमों को हराने का माद्दा रखता है। उस ज़माने में ऑस्‍ट्रेलिया की टीम को हारना किसी भी टीम के लिए नाको चने चबाने जैसा था। उस दौर में ऑस्‍ट्रेलिया की तूती बोलती थी और पूरे विश्‍व में ऑस्‍ट्रेलियन टीम का दबदबा था। भारत इस सीरीज़ में 0-1 से पिछड़ने के बाद कोलकाता पहुंची और यहां भी पहली पारी में भारत का बूरा हाल था, टीम हारने के कगार पर थी।

कोलकाता के ईडन गार्डन ने बदल दी भारतीय क्रिकेट की सोच

दूसरी इनिंग में भारत को फ़ॉलोऑन के बाद दोबारा बल्‍लेबाजी का न्‍योता दिया गया, ज‍हां अभी भी भारत को 300 के क़रीब लीड उतारनी थी। इसके बाद जो हुआ वो किसी चमत्‍कार से कम नहीं था। लक्ष्‍मण की 281 रन की अद्भुत पारी खेली और इनका भरपूर साथ दिया ‘दी वॉल’ राहुल द्रविड़ ने, जिन्‍होंने 180 रन की शानदार पारी खेली। दोनों के बीच रिकॉर्ड 376 रन की साझेदारी की और भारत ने 657 रन बना डाले। दूसरी पारी में खेलने उतरी ऑस्‍ट्रेलिया के विकेट 5वें दिन एक के बाद एक गिरते रहे और भारत ने इस मैच को जीतकर इतिहास रच दिया। इसके बाद चेन्‍नई के मैदान में भी भारत ने ऑस्‍ट्रेलिया को मात दी और श्रृंखला 2-1 से अपने नाम की। इस मैच में हरभजन सिंह की हैट्रि‍क कौन भूल सकता है।

बॉर्डर-गावस्‍कर सीरीज़ के बाद बढ़ा सौरव गांगुली का क़द

इस सीरीज़ के बाद ‘दादा’ का कप्‍तानी के तौर पर क़द काफ़ी ऊंचा उठा। साथ ही वी वी एस लक्ष्‍मण व राहुल द्रविड़ भारतीय बल्‍लेबाजी के स्‍तम्भ बनकर उभरे। इसके अलावा हरभजन सिंह स्‍पिन के जादुगर के रूप में विश्‍व में छा गए और फ‍िर पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद भारतीय क्रिकेट की सोच में बड़ा बदलाव आया। अब टीम जीतने के लिए खेलने लगी। सौरव गांगुली की कहानी यहीं ख़त्‍म नहीं हो जाती। इसके बाद तो ‘दादा’ की कप्‍तानी में भारत ने नए-नए इतिहास दर्ज किए। विदेश में जाकर जीतने की आदत डाली और बड़ी-बड़ी टीमों को संघर्ष करवाया। इसके आगे की कहानी अगले लेख में।  

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