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लोकल ट्रेन में हुई हत्‍या, मुंबई की लाइफ़लाइन आसान नहीं

  • मामूली विवाद पर प्रोफ़ेसर को मारा चाकू
  • भीड़ के चलते हर रोज़ होती हैं मामूली बहस

मुंबई की लाइफ़लाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेन मे मामूली से वादविवाद में किसी की हत्‍या कर दी जाए, तो यह बेहद गंभीर मामला है। पूरी मुंबई हर तरह से इस लोकल ट्रेन पर निर्भर करती है। सुबह और शाम के वक्‍़त भीड़ इस क़दर होती है, कि कभी-कभी चढ़ना और उतरना संभव नहीं हो पाता। यहां तक की कितनी लोकल ट्रेनें छोड़ देनी पड़ती हैं। ऐसे में हमें हर दिन ख़ुद के अंदर धैर्य बनाकर यात्रा करने की आवश्‍यकता है, क्‍योंकि हर रोज़ हमें इसी धक्‍का-मुक्‍की का सामना करना है। हम अगर अपना संयम खो देंगे, तो वो कभी भी हादसे का रूप ले सकता है।

आज की पीढ़ी में इसी संयम की कमी देखी जा रही है,  गुस्‍सा बहुत आता है और यही गुस्‍सा किसी घटना को अंजाम में बदल देता है। अगर ऐसा ना होता, तो 27 वर्षीय ओमकार शिंदे लोकल ट्रेन की भीड़ का फ़ायदा उठाकर विले पार्ले स्‍थि‍त नर्सी मॉन्‍जी कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स के प्रोफ़ेसर आलोक सिंह को मामूली बात पर धारदार हथियार से वार करके मौत के घाट ना उतारा होता। लोकल ट्रेन में भीड़ इस क़दर होती है, कि हर रोज़ मामूली बहस होना अब आम बात हो गई है और ये झगड़े कभी-कभी मारपीट में बदल जाते हैं, क्‍योंकि लोकल ट्रेन में सफ़र करने वाला हर आदमी जल्‍दी में है। ऊपर से काम पर सही समय पर पहुंचने की जल्‍दी होती है। ऐसे में उसे एक मिनट की देरी भी बर्दाश्‍त नहीं।

आरोपी ओमकार शिंदे ने तो अपना गुस्‍सा शांत करने के लिए प्रोफ़ेसर आलोक सिंह को मार डाला, लेकिन अगर उसे यह एहसास होता, कि इस गुनाह से उसका जीवन अंधकार में ही जाएगा, तो वो इस तरह की ग़लती करने का दुस्साहस नहीं करता। वो कहते हैं ना ‘अब पछताए होत क्‍या जब चिड़ि‍या चुग गई खेत’। ख़ैर आरोपी को स्‍टेशन के सीसीटीवी फ़ुटेज की मदद से घटना के 12 घंटे के अंदर पकड़ लिया गया है। अब सवाल उठता है, कि आरोपी को मिला क्‍या, अगर हम इस बात को गहराई से समझ जायें, तो ज़्यादातर अपराध अपने आप रुक जाएंगे। हमारे अंदर संयम आ जाएगा, लेकिन बदला लेने की भावना इतनी प्रबल होती जा रही है, कि सेकेंड भी नहीं लगता और मामूली विवाद बड़ी घटना में बदल जाता है।   

मुंबई जिसका नाम सुनते ही लोग बड़ी-बड़ी कल्‍पना करने लगते हैं, वहां इस तर‍ह की घटना से महानगरी कही जानें वाली मुंबई का यह रूप भी सामने आता है, जहां हर रोज़ करोड़ों लोग अपने जीवन यापन के लिए जूझ रहे हैं। मुंबई की लाइफ़लाइन आलोक सिंह के लिए एंडलाइफ़ बन गई और एक ही क्षण में प्रोफ़ेसर के परिवार में जीवन भर का अंधेरा दे गई, इसलिए आज के दौर में सतर्कता और संयम बेहद ज़रूरी है।        

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