- हाईकोर्ट ने भी हॉस्टल को लेकर पूछे गंभीर सवाल
- विकसित भारत में छात्रों की अनदेखी ठीक नहीं
दिल्ली के सत्य निकेतन में हुए हृदयविदारक घटना ने सभी को झकझोर कर रख दिया है। इससे अब दिल्ली में रहकर पढ़ने वाले छात्रों में डर बन गया है, क्योंकि यह कोई पहला हादसा नहीं है, जिसमें छात्रों की मौत हुई है, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में यह मामले लगातार बढ़ते हुए दिखाई दिए हैं। आज छात्रों की सुरक्षा बेहद गंभीर मुद्दा है, क्योंकि तैयारी कर रहे छात्रों के पास ठीक से रहने के लिए मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। देश में आजकल GDP ग्रोथ की चर्चा बहुत है, लेकिन हमारे देश के छात्रों के लिए ठीक से रहने के लिए जगह तक नहीं है। इस विकसित भारत के लिए यह बेहद गंभीर सवाल है, जिस पर सरकार को मंथन करने की ज़रूरत है।
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हाईकोर्ट ने कहा दिल्ली विश्वविद्यालय और MCD इसके ज़िम्मेदार
इन्हीं गंभीर सवालों को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने सत्य निकेतन इमारत हादसे पर गंभीर टिप्पणी करते हुए इस घटना को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा, कि इस हादसे ने दिल्ली विश्वविद्यालय और दूसरे कॉलेजों के हॉस्टल की कमी को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। हाई कोर्ट ने कहा, कि हादसे की ज़िम्मेदारी सिर्फ इमारत के मालिक की नहीं, बल्कि दिल्ली विश्वविद्यालय और MCD भी बराबर ज़िम्मेदार हैं। कोर्ट ने MCD से PG और हॉस्टल के नियंत्रण को लेकर मौजूद नियमों की जानकारी मांगी है।

हाईकोर्ट ने पूछे गंभीर सवाल
हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय से यह भी पूछा है, कि बाहर से आने वाले छात्रों के लिए DU और सरकार की ओर से कितने हॉस्टल उपलब्ध हैं? कोर्ट ने MCD से यह भी पूछा है, कि हादसे वाली इमारत सभी जरूरी मंजूरियों के साथ बनी थी या नहीं? इसके अलावा दिल्ली हाई कोर्ट ने MCD से सभी PG हॉस्टल की इमारतों की स्थिति पर रिपोर्ट भी मांगी है और यह भी पूछा है, कि ये इमारतें कानूनी नियमों के तहत बनी हैं या नहीं?
ज़िम्मेदारी ली गई होती, तो नहीं होता हादसा
कोर्ट ने इससे संबंधित सभी विभागों को 10 दिन के भीतर हलफनामा (एफिडेविट) दाखिल करने को कहा है। हादसे को लेकर कोर्ट ने कहा, कि MCD की ज़िम्मेदारी बनती है कि हर बिल्डिंग का निर्माण, मरम्मत नियमों के मुताबिक़ हो। हाईकोर्ट ने कहा, कि अगर प्राधिकरण ने ज़िम्मेदारी से काम किया होता है, तो शायद यह हादसा टल जाता।
बड़े-बड़े फ़्लैट्स बनते हैं, लेकिन छात्रों के लिए हॉस्टल नहीं
हाईकोर्ट के इस टिप्पणी के बाद हमारे सिस्टम पर कई बेहद गंभीर सवाल खड़ें कर दिए हैं। क्या हमारे देश के छात्र इस लायक नहीं, कि उनको सरकार व प्रशासन हॉस्टल की सुविधा दे सके। देश में पैसे कमाने के लिए बड़े-बड़े फ़्लैट्स बनाए जा रहे हैं, लेकिन छात्रों के रहने के लिए कोई बिल्डिंग नहीं बनाई जाती। सरकार के पास इतने प्रोजेक्ट्स हैं, लेकिन उन प्रोजेक्ट्स में एक भी प्रोजेक्ट्स ऐसे नहीं दिखते जो छात्रों की मूलभूत सुविधाओं को पूरी कर सके। सवाल यह है, कि सबको पता है, कि दिल्ली जैसे शहर में बड़ी संख्या में छात्र पढ़ने आते हैं, लेकिन बाजूद इसके ये सभी छात्र जर्जर इमारत में रहने के लिए मजबूर हैं, जहां उन्हें बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिलती।

सिर्फ़ छात्र नहीं, परिवार को मिलता है दर्द
एक तो जर्जर इमारत, जो कब ढह जाए पता नहीं और किराया देते हैं 15 से 25 हज़ार रुपये तक और उसके बाद भी तैयारी कर रहे छात्रों को बदले में मिलती हैं तकलीफ़ें। यह मामला सिर्फ़ छात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके साथ उनके पूरे परिवार को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। सत्य निकेतन की इमारत के नीचे सिर्फ़ छात्र नहीं दबे, बल्कि उनके परिवार के सपने भी उस इमारत में दब गए। उन परिवारों को जीवन भर का चोट दे गई, जो कभी नहीं भर सकेंगे।
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PG के नाम पर लूट मची है
आज देश में PG के नाम पर लूट मची है। हॉस्टल के नाम पर व्यापार चलाया जा रहा है। इनका मकसद सिर्फ़ पैसा कमाना है, इन्हें छात्रों के सपनों से कोई लेना-देना नहीं। ये छात्र बड़ी मुश्क़िल से पैसा इकट्ठा कर अपने परिवार से दूर अपने-माता-पिता का और अपना ख़्वाब पूरा करने के लिए बड़े शहरों में जाते हैं, लेकिन इन जर्जर मकानों का शिकार बन जाते हैं। यदि सरकार छात्रों के हॉस्टल पर ध्यान देती, तो शायद दिल्ली में PG के नाम पर लूट नहीं मचती। सत्य निकेतन हादसे ने MCD से लेकर PG के नाम पर हो रहे भ्रष्टाचार की पोल खोल कर रख दी है।
करोड़ो खर्च हाेते हैं इंफ्रास्ट्रक्चर पर, हॉस्टल पर क्यों नहीं
खाली ज़मीनों पर 50 मंजिला और 100 मंज़िला फ़्लैट्स तो बन जाते हैं, लेकिन सरकार खाली ज़मीनों पर छात्रों के लिए सस्ते दामों में फ़्लैट्स नहीं बनवा सकती। सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान देती है, लेकिन इस इंफ्रास्ट्रक्चर में छात्रों के लिए हॉस्टल वाली सुविधा को भी शामिल करना चाहिए। करोड़ों खर्च करके पुल, सड़क और एक्सप्रेस-वे का निर्माण किया जा रहा है, लेकिन करोड़ों खर्च कर सरकार तैयारी कर रहे छात्रों को मूलभूत सुविधाएं नहीं दे सकती। यह बड़े सवाल हैं, जो सरकार से पूछे जाने चाहिए। यदि हम छात्रो को रहने के लिए एक घर नहीं दे सकते, तो हमें विकसित भारत का सपना छोड़ देना चाहिए।






