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कॉमनवेल्थ गेम्स 2026: कौन हैं झंडू कुमार? जिनकी कहानी बताती है कि उम्मीद बहुत बड़ी चीज़ है

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में पैरा पावरलिफ्टिंग का कांस्य पदक जीतने वाले झंडू कुमार कौन हैं? जानिए सब्ज़ी बेचने से राष्ट्रमंडल पदक तक उनके संघर्ष और सफलता की प्रेरक कहानी।
  • सब्‍जी बेचने से लेकर चलाया ई-रिक्‍शा
  • 5 वर्ष की उम्र में हो गए थे पोलियो के शिकार

झंडू नाम सुनकर एक समय हम सोचने लगते हैं, कि अरे ये कैसा नाम है और मन में हंसी भी आती होगी। हम अक्‍सर अपने रोज़ाना के जीवन में यह शब्‍द इस्‍तेमाल कर ही लेते हैं और दोस्‍ती-यारी में, तो यह बोलना चलन में हमेंशा से रहा है, कि ‘अबे झंडू हो क्‍या’। मौजा-मस्‍ती में लिया जाने वाला यह शब्‍द जब किसी का सच में नाम हो और वो कुछ ऐसा कर जाए, जो इतिहास रच दे और पूरे विश्‍व में देश का नाम रौशन कर जाए, तब हम सब सोचने लगते है, कि आख़‍िर कौन है झंडू कुमार?

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झंडू कुमार को पावरलिफ्टिंग में ब्रॉन्‍ज़ मेडल

झंडू कुमार वो नाम है, जिसने ग्‍लास्‍गो में आयोजित कॉमनवेल्‍थ गेम 2026 में पैरा पावरलिफ्टिंग में ब्रॉन्‍ज़ मेडल अपने नाम किया है। यह सुनने में बहुत अच्‍छा लगता है और गर्व होता है, लेकिन इसके पीछे कितना संघर्ष रहा, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्‍क़‍िल है। मात्र 5 साल की उम्र में जिसे पोलियो ने अपना शिकार बना लिया हो, उसके लिए राष्‍ट्रमंडल खेलों में पहुंचकर मेडल जीतना अपनेआप में प्रेरणा है।

कभी सब्‍जी, कभी ठेला, तो कभी ई-रिक्‍शा

बिहार के नालंदा ज़‍िले के रहने वाले झंडू कुमार बेहद साधारण परिवार से आते हैं। उनके पिता सब्जी बेचकर परिवार का पालन-पोषण करते हैं। परिवार की आर्थि‍क स्‍थि‍ति को देखते हुए झंडू कुमार ने भी पिता के साथ सब्‍ज‍ी बेचने का काम किया और परिवार के पालन-पोषण में अपना योगदान दिया। यही नहीं उन्‍होंने पेट चलाने के लिए ठेले लगाए, ई-रिक्‍सा चलाया। वो जानते थे, कि अगर इस परिस्‍थिति से बाहर निकलना है, तो उनको कुछ अद्भुत करना होगा, इसलिए अपनी प्रतिभा को समझते हुए, वह सब्‍जी बेचने के बाद रोज़ाना ज‍िम जाकर अपने शरीर पर काम करते थे। कई निराशाओं के बाद भी वह कभी कमजोर नहीं पड़े।

190 किलोग्राम का उठाया भार, संघर्ष को बनाया प्रेरणा

ग्‍लास्‍गो कॉमनवेल्‍थ गेम में झंडू कुमार ही है, जिन्‍होंने भारत की तरफ़ से मेडल का खाता खोला। झंडू कुमार पैरा पावरलिफ्टिंग में तीसरे स्‍थान पर रहे। उन्‍होंने अपनी पहली कोशिश में 181 किलोग्राम वजन उठाया, इसके बाद दूसरी बारी में 190 किलोग्राम का भार उठाने में सफल रहे, लेकिन आख़‍िरी कोशिश में वह 196 किलोग्राम का वजन उठाना चाहते थे, लेकिन असफल रहे और राष्‍ट्रमंडल खेल में अपना पहला पदक जीतकर अपने संघर्ष को प्रेरणा में बदल दिया।

उम्‍मीद बहुत बड़ी चीज़

सुनने और लिखने में यह बेहद आसान लगता है, लेकिन जिस चुनौती से झंडू कुमार और उनका परिवार हर रोज़ जूझता होगा, वो आसान नहीं, लोग ऐसे संघर्ष में हर रोज़ टूट जाते हैं, हर रोज़ हारते हैं। ऐसे में हम समझ सकते हैं, कि झंडू कुमार का यहां तक पहुंचना कितना कठिन रहा होगा। उन्‍होंने यह साबित कर दिया, कि परिस्‍थि‍ति कितनी भी ख़राब हो, लेकिन लगातार बिना रुके कोशि‍श करते रहने से एक दिन मंज़‍ि‍ल मिल ही जाती है क्‍योंकि उम्‍मीद बहुत बड़ी चीज़ होती है। अब ‘अबे झंडू हो क्‍या’ को मजाक में नहीं, बल्‍कि गर्व का एहसास होगा।     

बिहार में ख़ुशी का माहौल  

झंडू कुमार की इस उपलब्धि के बाद उनके परिवार के अलावा पूरे नालंदा में ख़ुशी का माहौल है। स्थानीय लोग इसे बिहार के लिए गौरव का क्षण बता रहे हैं। उनके परिवार के लोगों ने उनकी सफलता पर गर्व जताते हुए कहा, कि यह झंडू की मेहनत और समर्पण का ही परिणाम है। साथ ही कोच ने भी यह विश्‍वास जताया, कि झंडू कुमार आने वाले समय में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश के लिए और अधिक पदक जीतेंगे।

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