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वंदे मातरम् के 150 साल, हिल गई थी कभी इस गीत से अंग्रेज़ों की नींव

  • गणतंत्र दिवस 2026 की थीम थी- ‘वंदे मातरम् के 150 साल’
  • विकसित भारत बनने के लिए समझना होगा इस गीत का महत्‍व

1875 में जब बंकीमचंद्र चटर्जी ने वंदे मातरम् गीत की रचना की थी, तब किसी ने सोचा तक नहीं होगा, कि यह गीत भारत की आज़ादी में ऐसी भूमिका निभाएगी, कि अंग्रेज़ों की नीव हिला देगी। अंग्रेज़ इस गीत की ताक़त से इतना डर गए थे, कि अंग्रेज़ों ने वंदे मातरम् के नारे पर रोक लगाने की नाक़ाम कोशिश की। वंदे मातरम् आज़ादी के दिवानों पर इस तरह सर चढ़ कर बोल रही था, कि रोक लगाने के बावजूद इस गीत की गूंज अंग्रेज़ों के कानों में गूंजती रही।

वंदे मातरम् ने अपने 150 वर्ष पूरे कर लिए हैं और इन 150 वर्षों में वंदे मातरम् ने नाजाने कितने इतिहास अपने अंदर समाहित किए हुए हैं। आज़ादी की प्रत्‍यक्ष प्रमाण वंदे मातरम् महज एक गीत नहीं है। इसमें छिपी है भारत की सम्‍पूर्ण संस्‍कृति और भारत की एकता। यह प्रतीक है हमारे स्‍वाधीनता संग्राम की। यह सबूत है उन शहिदों और बलिदानियों की, जिन्‍होंने इस मातृभूमि के लिए अपना सबकुछ न्‍योछावर कर दिया। वंदे मातरम् में इतनी ताक़त थी, कि इसने स्‍वाधीनता संग्राम में पूरे भारत को एकजुट कर दिया था और यह गीत उस दौर में अंग्रेज़ो के खिलाफ़ इतना मजबूत औज़ार बन गया था, कि वंदे मातरम् आज भी भारत के इतिहास में स्‍वर्निम दीपक बनकर जल रहा है।

इस साल के गणतंत्र दिवस का थीम भी यही रखा गया था- वंदे मातरम् के 150 साल, क्‍योंकि भारत का गणतंत्र इस राष्‍ट्रीय गीत के बिना पूरा नहीं हो सकता। वंदे मातरम् के सम्‍मान में 2026 की परेड और झांकियां कर्तव्‍य पथ पर एक नया आयाम स्‍थापित कर गई। वंदे मातरम् का ना किसी जात-पात से और ना ही किसी धर्म से रिश्‍ता है। इस गीत ने हमेशा से एकजुट रहने की शि‍क्षा हमें दी है और राष्‍ट्र गीत की यही ख़ासियत कर्तव्‍य पथ पर देखने को मिली।   

150 साल के इस सफ़र में इस राष्‍ट्रीय गीत ने कई उतार-चढ़ाव देखे। यह राज‍नीति की भेंट चढ़ी, इसे धर्म से जोड़कर देखा जाने लगा, जहां से हिंदू-मुस्‍लिम जैसी राजन‍ीति भी पनपती दिखाई देती है, लेकिन इस गीत की रचना बंकिमचंद्र चटर्जी ने इसलिए की थी, ताक़‍ि‍ वो अपने देश की जनता में राष्‍ट्र की भावना जगा सकें और ब्रिटिश शासन का मिलकर विरोध कर सकें। इसी राजन‍ीति के चलते शायद आज़ादी में महत्‍वपूर्ण योगदान देने वाले इस गीत को राष्‍ट्रगान का दर्जा नहीं मिल पाया। जब इसके अर्थ को समझेंगे, तो हमें ज्ञात होगा, कि इस गीत की रचना उस समय इसलिए की गई थी, क्‍योंकि इसमें भारत माता का गुनगान किया गया है, इसमें भारत की ख़ूबसूरती और संस्‍कृति दिखाई देती है। यह गीत भारत को परिभाषि‍त करती है।

सच तो यह है, कि वंदे मातरम् ने हमेंशा से देश को एकजुटता की राह दिखाई है। आज का भारत आधुनिक भारत तो बन गया, लेकिन आज का भारत धर्म और जात में बटा हुआ दिखाई देता है। भाषा में बटा में हुआ है, लेकिन सारे जहां से अच्‍छा हिंदुस्‍तां हमारा किसी ज़माने में सिर्फ़ इंसानियत की भाषा जानता था और छोटा हो या बड़ा, हिंदू हो या मुस्‍लि‍म सबने एक साथ मिलकर आज़ादी की लड़ाई लड़ी। दुख की बात है, कि फूट डालों राज करो वाली राजनीति ने इस भारत को सही से पनपने नहीं दिया और आज यही राजनीति भारत को विकसित बनने से रोक रही है।

गणतंत्र दिवस की थीम वंदे मातरम् के 150 साल रखने का मतलब महज यह नहीं है, कि हम इस गीत को सुने और गुनगुनाएं, बल्‍कि हमें इस गीत को अगर सही सम्‍मान देना है, तो इस गीत के महत्‍व को जानना होगा। हमें समझना होगा, कि कैसे यह गीत धीरे-धीरे राष्‍ट्र का गीत बन गया। विकसित बनने का मतलब सिर्फ़ टेक्‍नोलॉजी का आना नहीं है,नए-नए आविस्‍कार होना नहीं है। विकसित भारत का अर्थ है, कि हम अपने विचारों को भी अपडेट करें, भारत की संस्‍कृति को समझें और अपने अंदर एकजुट की भावना पैदा करें। नहीं, तो वेंदे मातरम् बस यूहीं एक गीत बनकर रह जाएगा और हम इसे 26 जनवरी और 15 अगस्‍त को सिर्फ़ गुनगुनते रहेंगे।   

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