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दिल्‍ली अग्‍निकांड: क्‍योंकि सवाल पूछना ज़रूरी है!

विकसित मतलब बड़ी-बड़ी बिल्‍डिंग तैयार करना नहीं है, बल्‍कि विकसित ईमानदारी, सच्‍चाई, मानवता और विचारधारा की नींव है।

बीते 3 जून को जिस तरह मालवीय नगर होटल में आग लगी और 21 लोगों ने अपनी जान गंवाई, वो देश में कई सवाल छोड़ जाता है और यह सवाल उठाना ज़रूरी है, क्‍योंकि‍ आख़‍िर कब तक आम आदमी भ्रष्‍टाचार और बेईमानी का शिकार बनता रहेगा। ऐसे होटल देश में चल ही क्‍यों रहे हैं, जो आम आदमी को सुरक्षा नहीं दे सकते।

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आइए मिलकर सवाल पूछें, आख़‍िर क्‍यों?

1) आज हमारे देश में विकसित भारत की चर्चा होती रहती है, लेकि‍न मैं सवाल पूछना चाहता हूं यहां पर, कि क्‍या ऐसे मौत के हादसे हमें विकसित भारत बनने देंगे, जहां अवैध निर्माण से लोग अपनी जान गवां देते हैं?

2) आज देश का सबसे बड़ा सवाल यही है, कि जहां नियमों के हिसाब से 6 कमरे ही बनने चाहिए थे, वहां 25 कैसे बन गए? मतलब जिस देश में नियमों का पालन करने की सीख हमेंशा से दी जाती है, वहां नियमों का तार-तार कर दिया गया। कौन हैं, ये लोग जो पैसे के लालच में नियमों को भूल जाते हैं?

3) इस हादसे से यह तो साफ़ नज़र आ रहा है, कि वो चाहे नगर निगम हो या हमारा प्रशासन उन्‍होंने अपनी ज़‍िम्‍मेदारी सही से नहीं निभाई और यह सिर्फ़ इस होटल के साथ नहीं है, ऐसे कई होटल हैं देश में, जो अगली घटनाओं का इंतज़ार कर रहे हैं। इसे रोकने की ज‍़‍िम्‍मेदारी आख़‍िर किसकी है?

4) इस अग्‍निकांड से यह तो साफ़ है, कि हमारे देश में भ्रष्‍टाचार की हद हो गई है। 21 लोगों की मौत बेईमानी, लालच और भ्रष्‍टाचार का प्रत्‍यक्ष उदाहरण है। इसका ख़ामियाजा भुगत कौन रहा है- आम आदमी और इस होटल में भी अग्‍निकांड का शि‍कार हुआ, तो वह आम आदमी। क्‍या इसकी भरपाई होटल का मालिक़ कर पाएगा? क्‍या प्रशासन के पास जवाब है इसका?

5) इस दर्दनाक अग्‍निकांड का ज़‍िम्‍मेदार सिर्फ़ वो होटल मालिक़ नहीं है, जो लोगों को जलता देख भाग निकला, बल्‍कि वो सब ज़‍िम्‍मेदार हैं, जि‍न्‍होंने पैसे के लालच में 6 की जगह 25 कमरे बनने दिए।

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6) 25 कमरों का यह होटल कैसे बिना सुरक्षा के चल सकता है, क्‍या आम आदमी की जान इतनी सस्‍ती है? क्‍या मजाक बनाकर रखा है? किसी को भी किसने हक़ दिया किसी की जान लेने की। 21 लोग जो इस आग में झुलस गए, यह हादसा करवाया गया है। क्‍या प्रशासन की लापरवाही की वजह से नहीं हुआ है यह हादसा?

7) नगर निगम ग़रीबो के ठेले हटाने के लिए तुरंत जोर लगाने लगती है, लेकिन उसे 25 कमरो का अवैध होटल कैसे नहीं दिखा। असल में हमारे समाज का एक बहुत बड़ा तबका ताक़त के पीछे भाग रहा है। यहां ताक़त का मतलब बेईमानी और लालच है। आख़‍िर ऐसे मौत के होटल को चलाने की इजाज़त कौन देता है?

8) एक ही परिवार के 9 लोग इस आग में झुलस गए, यह हमारे सिस्‍टम की सबसे बड़ी नक़ामी है। एक ही परिवार के 9 लोगों की मौत हमारे सिस्‍टम पर प्रश्‍न चिन्‍ह खड़ा करता है।

9) यहां तो मानवता भी तार-तार हो गई। होटल का मालिक़ खुद आग लगने बाद और लागों को जलता देख भाग निकला। मतलब उसे अपनी जान प्‍यारी थी, लेकिन बा़क़ी लोग मरे-जिएं इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अगर फ़र्क नहीं पड़ा तो ऐसे मालिक़ को सख्‍त से सख्‍त से सजा मिलनी ही चाहिए, जो उदाहरण बने उन लोगों के लिए, जो मानवता का गला घोंट रहे हैं।

10) अगर हम आज नहीं सुधरे तो आने वाले समय में ऐसे हादसे होते रहेंगे और हमारे विकसित भारत की नींव को हिलाते रहेंगे। विकसित मतलब बड़ी-बड़ी बिल्‍डिंग तैयार करना नहीं है, बल्‍कि विकसित ईमानदारी, सच्‍चाई, मानवता और विचारधारा की नींव है, जिसपर चलकर देश ने कभी आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी।           

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