- ममता बनर्जी अपनी ही सीट नहीं बचा पाई
- नहीं चली मुस्म वोट वाली राजनीति
यह एक दिन का संघर्ष नहीं था
आख़िरकार बंगाल में वो हुआ जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी, लेकिन भारतीय जनता पार्टी इस बार पूरे विश्वास के साथ ममता बनर्जी के किले को फ़तह करने की लड़ाई लड़ रही थी। यह एक दिन में नहीं हुआ, बल्कि बंगाल की जीत में कई वर्षों का संघर्ष छिपा है। यह जीत इतनी आसान नहीं थी। जनता के मन से ममता सरकार का डर और भय निकालना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं रहा। वो कहते हैं ना, कि प्रयास लगातार किया जाए, तो वो सुबह कभी तो आएगी और बंगाल में उस सूर्य का उदय हो चुका है।
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डर को डरा कर जनता ने चुना वोट
गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस तरह से बंगाल चुनाव में बिना थके लगातार बंगाल की जनता के बीच जाकर उनके लिए प्रेरणा बने, जिसने इस चुनाव में सबके मन से भय को निकालकर एकजुट होकर वोट करने की सोच को पैदा किया। इसके अलावा चुनाव आयोग भी इस बार हिंसक नहीं, बल्कि निष्पक्ष चुनाव कराने की हर संभव कोशिश करता रहा, जिसमें वो कामयाब भी हुआ।
भवानीपुर सीट से ममता का हारना यह बताता है, कि सच में बंगाल के नागरिक ममता दीदी की तानाशाही वाली राजनीति से उब चुके थे। उन्हें डर नहीं अब आज़ादी चाहिए था। आइए जानते है, कि इस चुनाव में TMC की हार के मुख्य कारण क्या रहे:
1) SIR रहा बड़ा मुद्दा: पश्चिम बंगाल चुनाव में इस बार जो मुद्दा जमकर बोला, वो रहा SIR। SIR प्रक्रिया में बंगाल से क़रीब 91 लाख नाम वोटर लिस्ट से कट गए।
2) घुसपैठिये: ये मुद्दा भी बंगाल की राजनीति में हुए एतिहासिक बदलाव का मुख्य कारण रहा। बीजेपी चुनाव प्रचार के दौरान बंगाल में रह रहे अवैध रूप से बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा जोर-शोर से उठाती रही और बताया, कि ममता सरकार ने कैसे अवैध रूप से इन घुसपैठियों के वोटर कार्ड बनाए।
3) आम जनता का संघर्ष: इन घुसपैठियों की वजह से वहां की आम जनता को रोजगार से लेकर मूलभूत सुविधाओं के लिए भी संघर्स करना पड़ा है, लेकिन TMC के लिए ये घुसपैठिये वोट बैंक थे, इसलिए उनके ख़िलाफ़ कोई एक्शन नहीं लिया गया।
4) मुस्लिम वोट की राजनीति: TMC के लिए इस बार मुस्लिम वोट की राजनीति वाला दाव उल्टा पड़ गया। हिंदु एकजुट हुए और बटे नहीं और बीजेपी को समर्थन दिया। बंगाल की जनता ने सेकुलरिज़्म की राजनीति को उखाड़ फ़ेका है।
5) TMC से उब चुकी थी जनता: बंगाल चुनाव के इतिहास में अबतक की रिकॉर्ड वोटिंग हुई। लोग इस बार डर के माहौल से बाहर निकल कर TMC के ख़िलाफ़ वोट देने निकले। ये जनता ममता सरकार की मनमानी और तानाशाही से उब चुकी थी।
6) ग़रीब, किसान और पिछड़े वर्ग का संघर्ष: ग्रामीण क्षेत्रों में वहां के ग़रीब, किसान और पिछड़े वर्ग लगातार संघर्ष कर रहे थे। यहां तक की TMC के ख़िलाफ़ आवज़ उठाने पर उन्हें मारा-पीटा जाता था। जान से मार दिया जाता था। महिलाओं के साथ बलात्कार किए गए। शवों को पेड़ से बांधने जैसी घटना ने वहां अत्याचार की सीमा पार कर दी थी।
7) आरजी कर मेडिकल कॉलेज दुष्कर्म और हत्या ममला: आरजी कर मेडिकल कॉलेज दुष्कर्म के बाद हत्या मामले की पीड़िता मां रत्ना देबनाथ को भारतीय जनता पार्टी ने पानीहाटी सीट से मैदान में उतारा। यह वही मां है, जो ममता सरकार से अपनी बच्ची के इंसाफ़ की मांग करती रही, लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी। आज बंगाल की जनता ने उन्हें चुना और भारी वोटों से चुना है। ये ममता सरकार की नाकामी को दर्शाता है।
8) 7वां वेतन आयोग न लागू होने से सरकारी कर्मचारी नाराज़: 7वें वेतन आयोग के अभी तक लागू न होने से सरकारी कर्मचारी बहुत नाराज़ थे। 2016 में 7वें वेतन आयोग को केंद्र सरकार ने लागू कर दिया था और ममता सरकार 2011 से ही बंगाल में सत्ता जमाए बैठी थी। 2016 से 2026 तक भी 7वां वेतन आयोग लागू नहीं किया। ये TMC की बड़ी हार का कारण है।
9) पूरे बंगाल में जय श्री राम की गूंज: चुनाव जीतने के बाद जिस तरह से पूरे बंगाल में जय श्री राम के नारे गूंज रहे हैं, ये बताता है, कि किस तरह वहां के हिंदू आवाम के आवाज़ को दबा दिया गया था, जिसे बाहर निकालने के लिए लोग बेताब थे। ममता बनर्जी ने एक बार कहा था, कि जय श्री राम बोला तो खाल ख़िचवा लूंगी।
10) भ्रष्टाचार और घोटाले: बंगाल में विकास व शिक्षा की बद्तर स्थिति, भ्रष्टाचार और घोटाले के प्रति बंगाल की जनता काफ़ी नाराज़ थी। TMC के नेता पार्थ चटर्जी का शिक्षक भर्ती घोटाला इसका बड़ा उदाहरण है।
11) महिला सुरक्षा: आरजी कर हत्याकांड के बाद पीड़िता की मां को इंसाफ़ नहीं मिला, जिसको लेकर जनता में रोष था। यहीं से महिला सुरक्षा का मुद्दा बंगाल में उठने लगा और बंगाल ने चुनाव के माध्यम से TMC से क़रारा जवाब दिया।



