नालंदा के शीतला मंदिर की भगदड़, आस्‍था की परिभाषा पर उठाता है सवाल!

सबके अंदर आस्‍था होती है, परंतु आस्‍था के नाम पर भीड़ इकट्ठा करना और हादसे का शिकार होना ये कहां तक उचित है।
  • भगदड़ में 8 लोगों की हो गई थी मौत
  • पहले भी होते रहे हैं हादसे, कब खुलेगी आंख

कबीरदास जी ने कहा था

मोकों कहां ढूंढ़े रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।

ना मैं मंदिर ना मैं मस्जिद, ना काबे कैलास में।

ना तो कौन क्रिया-कर्म में, ना हीं योग बैराग में।

खोजी होय तो तुरंत मि‍ल जाउं, पल भर की तलास में।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, सब स्वांसों की स्वांस में।

लेकिन हम इसका अर्थ कभी समझ नहीं पाए या समझने की कोशिश नहीं की। अगर इन पंक्‍तियों का अर्थ समझ गए होते, तो हम मंदिरों में हो रहे भगदड़ का शिकार नहीं होते। सच यह है, कि ईश्‍वर के दर्शन के लिए किसी समय की पाबंदी नहीं है या ईश्‍वर किसी विशेष अवसर का इंतज़ार नहीं करता। हम आंख बंद करके भी परम-पिता से अपनी बात रख सकते हैं, लेकिन हम दिखावे के शिकार बनते जा रहे हैं और सही भक्‍ति को कभी जान ही नए पाए।

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ईश्‍वर ने कभी नही कहा

सबके अंदर आस्‍था होती है, परंतु आस्‍था के नाम पर भीड़ इकट्ठा करनाऔर हादसे का शिकार होना ये कहां तक उचित है। ईश्‍वर ने कभी नहीं बोला, कि आप इसी दिन और इतने ही समय पर मेरी पूजा करेंगे, तो ही मैं ख़ुश रहूंगा, लेकिन अगर ऐसा होता, तो मंदिर में भगदड़ क्‍यों मच रही है और लोग उस पवित्र स्‍थल पर अपनी जान गवां दे रहे हैं। आख़‍िर ख़ुदा ऐसा तो नहीं चाहता होगा।

भगदड़ का ज़‍िम्‍मेदार कौन?

इस सबका ज़‍िम्‍मेदार कौन है? दिमाग पर ज़ोर डालें तो पता चलेगा, कि इसका ज़‍िम्‍मेदार इंसान ख़ुद है। हमने आज भक्‍ति को व्‍यापार बना दिया है और इसी व्‍यापार और भक्‍ति के सही अर्थ को ना समझपाने की नासमझी आज मंदिरों में भगदड़ का रूप लेता जा रहा है। इस धरती पर बड़े-बड़े महापुरुष पैदा हुए, जिन्‍होंने भक्‍ति के सही मार्ग को समझकर ज्ञान प्राप्‍त किया और लोगों तक ज्ञान पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन आज हम अपने कामों में इतना व्‍यस्‍त हो गए हैं, कि ख़ुद को ज्ञानी कहते हुए भी सही ज्ञान प्राप्‍त नहीं कर पाए।

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नालंदा के शीतला मंदिर में हादसा

एक बार फ‍िर भगदड़ की ख़बर सामने आई है, जिसमें कई लोगों की मौत की ख़बर भी आई। इस बार यह भगदड़ नालंदा, बिहार के शीतला मंदिर में हुई। चैत्र महीने के आख़‍िरी मंगलवार को शीतलाष्टमी के अवसर पर यह बड़ा हादसा बड़ा ही दुर्भाग्‍यपूर्ण है। जो लोग इस हादसे का शि‍कार हुए वो उस दिन सुबह उठकर उमंग के साथ शीतला मंदिर पूजा अर्चना करने गए होंगे, लेकिन उन्‍हें क्‍या पता था, कि भगदड़ उनका इंतज़ार कर रहा है। इस भगदड़ में 8 लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हो गए थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मंगला मेला के चलते भीड़ काफ़ी बढ़ गई थी, जिसके चलते अचानक भागादौड़ी मच गई और लोग एक-दूसरे पर गिरने लगे।

भगदड़ छोड़ देते हैं कई सवाल  

हमारे देश में अक्‍सर तीर्थ स्‍थलों और मंदिर से भगदड़ की ख़बरे आती रहती हैं और लोग अपनी जान गवां देते हैं या बूरी तरह चोटिल होकर जीवन भर का दुख अपने साथ लेकर चले जाते हैं। मंदिरों में लोग ईश्‍वर के पास सुख-समृद्धि‍ के लिए जाते हैं, अपने दुख बांटने जाते है, लेकिन भगदड़ जैसे हादसे लोगों के मन में कई सवाल छोड़ जाते हैं। प्रशासन, पुलिस, सरकार, राजनीति और सुरक्षा के प्रति प्रश्‍न खड़े होते ही हैं, वहीं लोगों का पूजा-आस्‍था से भी विश्‍वास डगमगाने लगता है।

इतिहास गवाह रहा है

पिछले साल महाकुंभ में मौनी अमावस्‍या के दौरान हद से ज़्यादा भीड़ जमा होने से बड़ा हादसा हुआ था और भबदड़ में बड़ी संख्‍या में लोगों की जान चली गई थी। साथ ही आंध्रप्रदेश के तिरुपति मंदिर में भी टोकन लेने के दौरान भगदड़ मच गई थी और बेकसूर लोग मारे गए। साथ ही 2023 में हिमाचल प्रदेश के नैना देवी मंदिर में भी हादसे से 30 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी। इससे भी बड़ा हादसा हाथरस में स्‍वयंभू बाबा के सत्‍संग के दौरान हुआ था, जहां 100 से ज़्यादा लोग मारे गए, जिसमें बड़ी संख्‍या में बच्‍चे शामिल थे। ऐसे कितने ही उदाहरण है, जहां मंदिर दर्शन के दौरान लोग घर से मनोकामना लेकर निकले, लेकिन दुर्भाग्‍य से घर वापस नहीं लौट पाए।

सवाल किससे पूछें?

इस घटना के लिए किससे सवाल करें, कौन सुनेगा सवाल और उत्‍तर कौन देगा? अक्‍सर हम ऐसी घटनाओं के लिए भी ईश्‍वर को कोसने लगते हैं, लेकिन यह ज‍़‍िम्‍मेदारी सरकार, पुलिस और प्रशासन की तो है ही, वहीं उन लोगों पर भी शिकंजा कसा जाना चाहिए, जो मौज-मस्‍ती के लिए और राजनीति दृष्‍टि से अफ़वाह फ़ैलाते हैं, जिसमें मासूम अपनी जान गवां देते हैं। क्‍या आज के दौर में जान इतनी सस्‍ती हो गई है?

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