तंबाकू कारोबारी के बेटे शिवम ने लैंबॉर्गिनी कार से सड़क पर चल रहे लोगों को रौंदा
मौक़े से दूसरी गाड़ी में बिठाकर बाउंसर्स ने भगाने में की मदद
पुलिस आरोपी को पकड़ तक नहीं पाई
उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक बार फिर अमीर और ग़रीब के बीच के फ़र्क को साफ़ देखा जा सकता है। यह भी पता चलता है, कि एक आम आदमी आम ही होता है और ख़ास अपने हिसाब से क़ानून को चलाता है। हम कितनी भी बड़ी-बड़ी बातें करलें, कि इस देश में सब समान है, सब के लिए क़ानून एक बराबर है, लेकिन धरातल पर ये सब कागज़ी बातें लगती हैं। हम वंदे मातरम् के 150 साल का जश्न तो मनाते हैं, लेकिन इस गीत का अर्थ नहीं समझ पाते।

10 करोड़ रुपये की लैंबॉर्गिनी कार से मारी थी ठोकर
कानपुर के अरबपति तंबाकू कारोबरी केके मिश्रा के बेटे शिवम मिश्रा ने अपनी लैंबॉर्गिनी गाड़ी से कुछ लोगों को कुचल दिया था और बुलेट गाड़ी पर अपनी कार चढ़ा दी थी। शुक्र है, कि इस हादसे में किसी की जान नहीं गई और सभी लोगों का प्राथमिक उपचार करने के बाद उन्हें घर छोड़ दिया गया। हमारे समाज में पैसों से लोगों की क़ीमत को तौला जाता रहा है। पैसा ही बताता है, कि कौन छोटा और कौन बड़ा है। शिवम ने जिस लैंबॉर्गिनी गाड़ी से लोगों को टक्कर मारी उसकी क़ीमत क़रीब 10 करोड़ रुपये है। हैरान करने वाली बात यह है, कि उस गाड़ी के पीछे उसकी सुरक्षा के लिए स्कॉर्पियो से बाउंसर्स चल रहे थे।

आम आदमी जीवनभर करता है संघर्ष
आख़िर कौन है, ये शीवम, जिसकी सुरक्षा के लिए पीछे बाउनसर्स चल रहे थे। ये कोई बड़ा अधिकारी है या कोई बड़ा नेता। सच तो यह है, कि इस अरबपति के बेटे ने ठीक से पढ़ाई तक नहीं की होगी, अपना अधिकतर समय अय्याशी में गुज़ारता होगा और एक तरफ़ है आम आदमी जो जीवन भर संघर्ष करता रहता है। पढ़ाई करता है, कि अच्छी नौकरी मिल सके। आम आदमी का पूरा जीवन परिवार को संभालने और रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने में निकल जाता है। एक तरफ़ हैं ये अमीरज़ादे, जिन्हें सबकुछ बैठे बिठाए मिल जाता है और उन्हें लगता है, कि वो कुछ भी कर सकते हैं, हर चीज़ उनकी है और क़ानून उनके हिसाब से चलेगा। नशा करना इनकी आदत है और शराब पीकर गाड़ी चलाने वाले ये लोग कानून को कुछ नहीं समझते, क्योंकि इनके पास पैसा है और पैसे में बहुत दम होता है। ये कुछ भी करेंगे और तरह-तरह की कहानी बनाएंगे और पैसा फ़ेकेंगे सब ठीक हो जाएगा।

फ़र्क है अमीर और ग़रीब में
इस केस में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। जब शिवम ने अपनी गाड़ी लोंगों और बुलेट से भिड़ाई तब उसके पीछे चल रहे बाउंसर्स तुरंत गाड़ी से उतर कर उसका बचाव करने लगे और दूसरी गाड़ी मंगा कर उसे धीरे से निकाल दिया। इससे वो पुलिस के हिरासत में नहीं आया और शुरुआती जांच और पूछताछ भी नहीं हो पाई। गुनाह करने के बाद इनको अफ़सोस तक नहीं हुआं, ऊपर से बाउंसर्स से बचाव में बदतमीज़ी से बात कर रहे थे, क्योंकि पैसा का नशा है। शुरुआती जांच ना होने से यह पता नहीं चल पाया की शिवम शराब पीकर तो गाड़ी नहीं चला रहा था। इसकी जगह किसी आम आदमी से ये गुनाह हुआ होता, तो वो अबतक पुलिस के हिरासत में होता और पब्लिक उसे पीट-पीट कर अधमरा कर देती।
पैसा हो तो कहानियां बन जाती हैं
अब पैसे वालों की करामात देखिए अरबपिता पिता अपने गुनहगार बेटे को बचाने के लिए कहानियां गढ़ रहा है, कि उसका बेटा नहीं बल्कि उसका ड्राइवर मोहन गाड़ी चला रहा था और मोहन ने यह क़बूल भी कर लिया है, कि वही गाड़ी चला रहा था। उसके पक्ष में आया वकील भी यही बात कर रहा है, कि जब गाड़ी ड्राइवर चला ही नहीं रहा था, तो केस तो बनता ही नहीं। पिता ने तो यहां तक भी कह दिया, कि मोहन जब गाड़ी चला रहा था, तो शिवम को सीने में कुछ हुआ, जिसे देखकर ड्राइवर डर गया और गाड़ी का बैलेंस बिगड़ गया। पिता का कहना है, कि उसे इलाज के लिए दिल्ली भेेज दिया गया है। हालांकि सीसीटीवी फ़ुटेज में साफ़ देखा जा सकता है, कि गाड़ी शिवम चला रहा थाा।पुलिस अधिकारी ने हमें सीसीटीवी फ़ुटेज मिल गया है और हम इसे कोर्ट लेकर जाएंंगे।

भेदभाव तो है समाज में
इसे कहते हैं पैसे की ताक़त, जो इस केस में देखने को मिलती है। सदियों से ये प्रथा चलती आ रही है और हम हमेंशा समाज में एकता और सोहार्द की बात करते हैं। हम अक्सर ये गाना गातें हैं, कि हिन्द देश के निवासी सभी जन एक हैं, रंग-रूप भेष-भाषा चाहे अनेक हैं, लेकिन जब इस तरह की घटना होती है तो समझ आता है, कि भेदभाव तो है और यह कमजोर और ताक़तवर की परिभाषा इसी समाज से पैदा हुई है, जिसकी जड़े हिलाना इतना आसान नहीं।

योगी जी के बुलडोजर की ज़रूरत
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हमारी गुज़ारिश है, कि यहां आपके बुलडोजर की ज़रूरत है, ताक़ि ऐसे तम्बाकू अरबपति कानून को अपनी जेब में लेकर ना चलें, जो आमजन को कुछ समझते तक नहीं। ये वही आमजन है, जो आपकों चुनाव में वोट देकर जीताते हैं, ताक़ि आप उनकी सुरक्षा का ज़िम्मा ले सकें। ये भी माफ़ियाओं से कम नहीं, जो अपने बेटों को खुली छूट देतें हैं और आपराध करने पर उनके साथ खड़े होकर क़ानून को चेनौती देते हैं।
यह भी पढ़ें:
रिश्तों की डोर कमज़ोर करती डिजिटल दुनिया
फ़िल्मी दुनिया के ख़ामोश अंधेरे को बयां करता अरिजीत सिंह का सन्यास



