- चेक बाउंस केस में मिली सज़ा
- ‘अता पता लापता’ से बने कर्ज़दार
सब समय का खेल है
जीवन में हमेंशा से समय का बड़ा महत्व रहा है। समय या तो हमें अमीर बना दे, नहीं तो फ़कीर। सब समय का खेल है भाई, वरना राजपाल यादव जैसे बड़े कलाकार तिहाड़ जेल में नहीं होते। हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री के जाने-माने अभिनेता राजपाल यादव ने अपने फ़िल्मी करियर में हमेंशा लोगों को हंसाने का काम किया। कौन भूल सकता है ‘भूल-भूलैया’ के छोटे पंडित का रोल, कौन भूल सकता है ‘चुप-चुप के’ में नौकर बांडिया का किरदार। इसके अलावा ‘मालामाल वीकली’ में बजे बहादूर का रोल हो या फ़िल्म ‘हंगामा’ के राजा को कैसे भूला जा सकता है। ऐसे ही कितनी सुपरहिट मूवी में काम कर चुके राजपाल यादव को अपने जीवन में कभी पैसे की कमी से जूझना पड़ेगा और जेल तक जाना पड़ेगा, ये बात सोच में भी नहीं आती।
पास और दूर का फ़ेर
फ़िल्मी दुनिया दूर से जैसी दिखती है, अगर उसे पास से देखा जाए, तो सच बड़ा कड़वा सा लगेगा। क़ीमती कपड़ों में छिपे इन कलाकारों के निजी जीवन में क्या चल रहा है, ये कहना बड़ा ही मुश्क़िल है, क्योंकि बड़े पर्दे पर बनी छवि को कोई ख़राब नहीं करना चाहता, चाहे स्थिति कैसी भी हो, हम बस अपनी छवि को बरक़रार रखना चाहते हैं। स्क्रीन पर दिखने वाला मुस्कुराता चेहरा हम रियल लाइफ़ में भी दिखाना चाहते हैं।

‘अता पता लापता’ मूवी से बने कर्ज़दार
राजपाल यादव उन दिनों अपने करियर के अच्छे दौर में चल रहे थे और कई फ़िल्में साइन भी की थी। वर्ष 2010 में राजपाल यादव ने ‘अता पता लापता’ प्रोजेक्ट पर काम करने के योजना बनाई। इस फ़िल्म को बनाने के लिए उन्होने मुरली प्रोजेक्ट्स से 5 करोड़ रुपये कर्ज़ लिए थे। इस फ़िल्म का निर्देशन राजपाल यादव ने ख़ुद किया था और उनकी पत्नी राधा यादव इस फ़िल्म की प्रोड्यूसर थी। इस फ़िल्म की कुल लागत 11 करोड़ रुपये थी। राजपाल यादव को इस प्रोजेक्ट से बड़ी उम्मीदें थी, लेकिन 2 नवंबर 2012 को प्रदर्शित हुई यह मूवी बॉक्स-ऑफ़िस पर बूरी तरह पिट गई और करोड़ों भी नहीं कमा पाई और राजपाल यादव के लिए यह बहुत बड़ी क्षति थी। उनके सर पर करोड़ों का कर्ज़ा हो गया और फ़िल्मों में बड़े काम मिलना भी लगभग बंद हो गया था। कई वर्ष तो राजपाल यादव को काम ही नहीं मिला।
क्या थी फ़िल्म की कहानी?
‘अता पता लापता’ एक व्यंग थी, जिसमें हास्य के साथ हमारे समाज, सत्ता-शासन और प्रशासनिक कमियों को उजागर करने की कोशीश की गई थी। ऐसी ख़ामियों की तरफ़ ध्यान दिया गया था, जिसे वाकई में सुधारने की आज ज़रूरत है। अफ़सोस इस फ़िल्म को कोई देखने नहीं गया और जिसने देखा उसे समझ नहीं आई। हमारे देश में अब वो दौर चला गया जब आर्ट मूवी देखना पसंद किया जाता था और उसमें एक ये बढ़कर एक कलाकार पूरी सिद्दत के साथ काम किया करते है।

वो दौर चला गया
आज वो दौर है जहां सिनेमा घरों में आइटम सॉन्ग को पसंद किया जाता है। फ़िल्म में एक्शन होना चाहिए। ऐसी कहानियों को पसंद किया जाता है, जिसमें असल में कहानियां होती ही नहीं। यही वजह है, कि फ़िल्में आज एक आकर्षण बन कर रह गई है, जिसका यथार्थ से कोई संबंध नहीं होता। योग्यताएं ख़त्म होती जा रही हैं और यह मात्र व्यापार है और कुछ नहीं और इस व्यापार में आम कलाकार के लिए जगह बना पाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। यह एक ऐसी चुनौती है, जहां जीवन दांव पर लगाया जाता है।

बड़े-बड़े प्रोडक्शन हाउस को बस पैसे से मतलब
आज इंडस्ट्री में एक से बढ़कर एक टैलेंट हैं, लेकिन उन्हें काम के लिए हर रोज़ जूझना पड़ता है, वहीं एक तरफ़ बड़े-बड़े अभिनेताओं और डायरेक्टर के बेटों और रिश्तेदारों के पीछे बड़े-बडे प्रोडक्शन हाउस पैसा लगाते हैं, चाहे टेलेंट हो या ना हो। इन प्रोडक्शन हाउस को बस बिज़नेस चाहिए। भले ही इनकी फ़िल्में फ़्लॉप पे फ़्लॉप होती रहें, लेकिन इन्हें मौक़ा मिलता रहेगा और जिन्हें सच में काम की ज़रूरत है, उनसे चक्कर लगवाए जाएंगे। फ़िल्म इंडस्ट्री की सच्चाई यही है, कि जब तक आपका नाम और काम चल रहा है, तब तक ये प्रोडक्शन हाउस आपकी वाह-वाही करते रहेंगे, लेकिन जैसे ही आपके दिन ढलने लगते हैं आपको धीरे-धीरे भूला दिया जाता है। ऐसे ही कई टेलेंटेड लोगों के पास इंडस्ट्री में आज कोई काम नहीं है।
राजपाल यादव और तिहाड़ जेल
फ़िल्म के फ़्लॉप होने के बाद राजपाल यादव संकट में आ गए और 5 करोड़ को चुकाने में असमर्थ थे। हालांकि उन्होंने इस रकम को चुकाने के लिए प्रोडक्शन को चेक दिया था, लेकिन सारे चेक बाउंस हो गए और यह वो दौर था जब उनके पास काम आना बंद हो गया था और बार-बार चेक बाउंस होने पर कंपनी ने उन पर कानूनी कार्रवाई शुरू की, जिसके चलते 2018 में उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। बाद में वह ज़मानत पर बाहर आए।

कर्ज़ इतना ज़्यादा था, कि 5 करोड़ की रक़म ब्याज समेत 9 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। हाल ही में जब दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें राहत देने से मना किया और उनकी ज़मानत ख़ारिज करदी और 4 फ़रवरी को तिहाड़ जेल में समर्पन करने का आदेश दिया था। उस दौरान इस बड़े कलाकार राजपाल यादव ने एक बयान दिया था, कि ‘इतनी बड़ी रक़म चुकाने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे और फ़िल्म इंडस्ट्री में किसी के पास समय नहीं है’। ये बात फ़िल्म इंडस्ट्री के चकाचौंध के पीछे छिपे अंधकार को बयां करती है और यह भी बताती है, कि स्क्रीन पर गले मिलेने वाले कलाकार असल ज़िंदगी में किसी के सगे नहीं होते। वो बिरले ही होते हैं, जो ऐसी घड़ी में हमारा आपका साथ दें।
देर से सही मदद के लिए आई इंडस्ट्री के कुछ लोग
इस घटना के बाद सोनू सूद ने राजपाल यादव की मदद के लिए हाथ बढ़ाया है और कहा, कि इस अभिनेता ने इंडस्ट्री को कई यादगार फ़िल्में दी है और यही समय है, जब पूरी इंडस्ट्री को उनकी मदद करनी चाहिए, ताकि समाज में यह मैसेज जा सके, कि इंडस्ट्री दुख में उनके साथ है, वह अकेले नहीं हैं’। उन्होंने कहा, कि ‘सबके जीवन में बुरा वक़्त आता है’।
इसके बाद इंडस्ट्री के बड़े-बड़े नाम उनकी मदद के लिए सामने आ रहे हैं। इनमें सलमान ख़ान, अजय देवगन, नवाज़ुद्दीन, वरुण धवन के अलावा गायक मीका सिंह, गुरु रंधावा, यूट्यूबर केआरके, लालू प्रसाद के बेटे तेज प्रताप यादव, इंद्रजीत सिंह और गुरमीत चौधरी जैसे नाम सामने आए हैं।
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