- चुनाव में किए वादे को पूरा करने के लिए तेलंगाना में 600 लावारिस कुत्तों को ज़हर देकर मारने की हुई क्रूर घटना
इंसान की उत्पत्ती जबसे हुई उसने अपनी सुविधा के लिए वो सब कुछ किया जिससे उसका जीवन ज़्यादा से ज़्यादा आसान बन सके। इसके लिए उसने कई अविष्कार किए, खोजें की और इसी बढ़ती लालसा में वो इतना डूब गया, कि उसे इतना ध्यान भी नहीं रहा, कि उसने प्राकृतिक का कितना नुकसान किया। उसे लगा इस प्राकृतिक पर सिर्फ़ उसी का हक़ है और वो अपनी इच्छा अनुसार जो चाहे कर सकता है।
नतीजा यह हुआ, कि आज बड़े-बड़े जंगल काट दिए गए हैं, जहां कभी जानवरों का अधिकार हुआ करता था। सच यह है, कि हमने उन्हें पहले बेघर किया और फिर जगह-जगह चिड़ियाघर के नाम पर उनको पिंजरे में क़ैद किया, ताक़ि वो इंसानों का मनोरंजन कर सकें और वो आय का साधन बन सके।
अब जब हम उनके रहने की जगह छीनकर ख़ुद के लिए आशियाना तैयार करने में लगे हैं, तो सवाल उठता है, कि ये बेज़ुबान जानवर जायें कहां? अब ऐसे में वो भटक कर घरों, मुहल्लों और बस्तियों में पहुंच जा रहें है, तो इसमें उनकी क्या ग़लती? तेलंगाना में लावारिस कुत्तों के साथ जो किया गया, वो शर्मशार करने वाली घटना है। इंसान इस हद तक भी जा सकता है, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। पिछले दिनों तेलंगाना के कई हिस्सों में क़रीब 600 कुत्तों को ज़हर देकर मार दिया गया। ‘गौतम स्ट्रे एनिमल फ़ाउंडेशन’ ने इस मामले को गंभीरता से लिया और पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद से प्रशासन ने गुनहगारों पर भारतीय न्याय संहिता के तहत कार्रवाई करना शुरू कर दिया है।

हाल ही में तेलंगाना में ग्राम पंचायत के चुनाव हुए थे, जिसमें इन लावारिस कुत्तों को गांव से हटाने के वादे भी किए गए थे और चुनाव जीतने के बाद इन सरपंचों के ऊपर अपने वादे पूरे करने का दबाव भी था, जिसके चलते इन लोगों को वोट मिले होंगे। वोट बैंक और ‘हमने जो कहा वो कर दिखाया’ की झूठी उपलब्धी पाने के लिए सुनियोजित योजना बनाकर कुत्तों को ज़हर देकर मौत के घाट उतार दिया गया।
सवाल यह है, कि क्या अब चुनाव जितने और अपने वादों को पूरा करने के लिए नेता कुछ भी करेंगे। ऐसी घटनाओं से क्या यह मान लिया जाए, कि समाजसेवा व देशप्रेम जैसे शब्द सिर्फ चुनाव में वोट पाने तक ही सीमित हैं। देश में जब इस तरह की घटना होती है, तो ना सिर्फ इंसानियत पर से भरोसा कम होता है, बल्कि यह संदेश भी जाता है, कि हमारा कानून कितना कमजोर है। अगर आज इन सरपंचों ने इस घटना को अंजाम दिया है, तो हो सकता है कल कोई और झूठी वाहवाही पाने के लिए कुछ और क़दम उठाए।
अगर आपने जनता से इन लावारिस कुत्तों को गांव से दूर हटाने के वादे किए थे, तो इनको दूर लेजाने के कई तरीक़े थे। नियम और कानून के तहत कुत्तों को दूसरे स्थान पर पहुंचाया जा सकता था, लेकिन ऐसा करने के बजाए कुत्तों को ज़हर देकर मारना ठीक समझा गया। क्या इन बेज़ुबान जानवरों का हम इंसानों के समाज में कोई महत्व नहीं है। ये जानवर भी इसी प्राकृतिक का हिस्सा हैं। सच तो यह है, कि पेड़-पौधे अगर जीवित रखने में हमारी मदद ना करते, तो शायद हम इंसान अपनी लालसा के लिए इन पेड़-पौधों को कबका साफ़ कर चुके होते।
यह ख़बर उन लाखों लोगों के लिए किसी सदमें से कम नहीं है, जो एनिमल लवर्स हैं, जो प्राकृतिक से प्रेम करते हैं, जो इन बेज़ुबान जानवरों के हर दर्द से वाकिफ़ हैं। दुनिया में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन जानवरों के पीछे न्योछावर कर दिया, इस प्राकृतिक को समर्पित कर दिया। इन उदाहरणों से हमें सीखने की ज़रूरत है। उम्मीद है, कि हमारा कानून इन 600 कुत्तों को इंसाफ़ दिलाएगा और इस दरिंदगी के लिए सरपंच और उनके साथियों को कड़ी सजा देगा, जिससे की भविष्य में ऐसी घटना दोबारा ना हो।



