- 3 बहनों ने 9वीं मंजिल से क़ूदकर दे दी थी अपनी जान
- कोरियन लव गेम की लग गई थी लत
हाल ही में गाज़ियाबाद से एक पीड़ादायक ख़बर सामने आई थी, जिसने पूरे देश में सनसनी फ़ैला दी और सभी माता-पिता को सोचने पर मजबूर कर दिया, कि कहीं हमारे बच्चों को भी ऑनलाइन गेम्स की ऐसी लत तो नहीं लगी है। कुछ दिन पहले गाज़ियाबाद में भारत सिटी सोसाइटी फ़्लैट की 9वीं मज़िल से तीन बहनों ने एक साथ क़ूदकर आत्महत्या कर ली थी। बात बस इतनी सी थी, कि पिता द्वारा मोबाइल पर गेम खेलेने से मना करने और मोबाइल ले लेने मात्र से तीनों ने कूदकर जान दे दी, जिससे पूरा परिवार सदमें मे हैं। उन्होंने कभी सोचा नहीं था, कि एक गेम के लिए तीनों बेटियां खिड़की से छलांग लगा लेंगी। इस हादसे के बाद पिता ने सभी माता-पिता को अपने बच्चों को इस नशे से दूर रखने की सलाह दी है।

कोरियन लव गेम खेलने की हो गई थी आदि
तीनों बहनों की उम्र 16, 14 और 12 थी। तीनों एक ही कमरे में एक साथ रहती थी और कोरियन लव गेम खेलने की आदि हो चुकी थीं, ये एक ऐसा गेम था, जो टास्क पर आधारित था। यह सोचकर कभी-कभी हैरानी सी होती है, कि कोई मोबाइल गेम की ख़ातिर भी ख़ुदकुशी कर सकता है, वो भी तीन बहने एक साथ। यक़ीन तो नहीं होता, लेकिन आज के दौर में यह भी मूमकीन हो गया है। बताया जा रहा है, कि तीनों बहने कुछ वर्षों से स्कूल नहीं जा रही थी। इसका मतलब यह है, कि तीनों को कोरियन गेम्स की लत इस क़दर लग गई थी, कि धीरे-धीरे वही उनकी दुनिया बन गई थी। यही नहीं जांच में यह भी पता चला है, कि उनके ऊपर कोरियन कल्चर इतना हावी था, कि उठते-सोते बस कोरियन नज़र आता था। सवाल यही है, कि ऐसा क्या था उस कोरियन लव गेम में, जिससे दूर जाते ही बिना सोचे-समझे आत्महत्या जैसा क़दम उठा लिया गया। यह कोरियन गेम भी जांच का विषय है और इसकी भी जांच होनी चाहिए।

कभी मिट्टी में लोटने में आता था मज़ा
एक ज़माना था जब मोबाइल और वीडियो गेम नहीं हुआ करते थे और बच्चे खेलने के लिए घर की चारदिवारी से निकलकर बाहर पसीना बहाते थे। धूल-मिट्टी से लिपट कर एक सुकून मिलता था। कोई मैदान में क्रिकेट खेलता था, कोई फ़ुटबॉल, कोई कबड्डी, गुल्ली-डंडा कोई खो-खो, तो कोई बैडमिंटन और पिट्ठू जैसे कई खेल बाहर मैदानों में खेले जाते थे और हमारे मित्र भी कई बन जाते थे। इसके अलावा लुडो और चेस बाज़ार से ख़रीद कर लाया जाता था और आपस में खेला जाता था। इन खेलों को नि:स्वार्थ बिना लालच के खेला जाता था। आज के दौर में यह लगभग ख़त्म सा हो गया है और इन सभी खेलों ने अब मोबाइल में डिजिटल रूप ले लिया है। बाहर निकलने के बजाए बच्चे घर के अंदर बंद कमरे में इसे खेलते रहते हैं। इससे बच्चों के मेहनत करने में कमीं आई है और मानसिक रूप से भी मजबूत नहीं हो पा रहे हैं। इन गेम्स के लत में इतना डूब जातें हैं, कि उसके अलावा फिर कुछ नज़र नहीं आता।

व्यापार है सबकुछ, रिश्तों का महत्व नहीं
आजकल सबकुछ एक व्यापार की तरह हो गया है। इन गेम्स के माध्यम से मनोरंजन के बहाने व्यापार किया जा रहा है, जहां चाइनीज़ और कोरियन कंपनी इन गेम्स को बनाकर बच्चों को आकर्षित करती हैं और ऑनलाइन गेम्स के ज़रिए अच्छा-ख़ासा पैसा कमाती हैं। इन लोगों को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, कि इसका असर बच्चों और उनके परिवार पर कितना पड़ेगा। पैसा कमाने की लत ने आज बहुत कुछ ख़राब कर दिया है। हर चीज़ अब बनावटीपन सा लगता है। प्रत्यक्ष रिश्तों से ज़्यादा डिजिटल दुनिया अपनी लगने लगती है। जो गाज़ियाबाद में हुआ, वो इसी का नतीज़ा है। दरअसल इन गेम्स में इतने टास्क होते हैं, कि इसे पूरा करने की चाह में हम सबकुछ भूल जातें है और किसी क़ीमत पर इसे ख़त्म करके ही दम लेते हैं। यह टास्क पूरा ना हो पाए तो हमारे अंदर एक चिड़चिड़ापन पैदा होने लगता है।

मोबाइल में डूबे लोग
अक्सर हम जब ट्रैवल करते हैं, किसी लोकल ट्रेन या मैट्रो में, तो अक्सर यह देखने को मिलता है, कि सब अपने मोबाइल में डूबे रहते हैं, उन्हें अगल-बगल क्या हो रहा है, दिखाई ही नहीं देता और मतलब भी नहीं होता। जब हमें पता नहीं होता, कि हमारे आस-पास क्या हो रहा है, तभी हादसे भी अचानक जन्म ले लेते हैं। ऐसे कई ख़बरे भी दुनिया भर से आती रहती हैं, कि रील बनाने में किसी की जान चली गई। इनमें से ज़्यादातर लोग गेम्स में लगे रहते हैं। वहां सिर्फ़ बच्चे नहीं होते बल्कि बड़े भी गेम खेल रहे होते हैं। गेम खेलना बिलकुल भी बूरी चीज़ नहीं है, लेकिन उसे नशा बना लेना यह बूरी बात है। उसे हमारा नुक़सान होने लगे तब वो हानिकारक है।
गाज़ियाबाद का ये हादसा हमें बहुत कुछ सिखाता है, लेकिन तभी जब हम कुछ सीखना चाहें। वरना ये एक ख़बर है और ख़बरे हर रोज़ बदल जाती हैं।
यह भी पढ़ें:
फ़िल्मी दुनिया के ख़ामोश अंधेरे को बयां करता अरिजीत सिंह का सन्यास



