- आम चुनाव में बीएनपी को मिले 212 सीट, कट्टर सोच जमात-ए-इस्लामी का अंत
- छात्र आंदोलन से बनी नेशनल सिटीजन पार्टी को जनता ने नक़ारा
तख़्तापलट के बाद पहली बार चुनाव
2024 में बहुत बड़ा छात्र आंदोलन हुआ था, जिसने शेख हसीना की सरकार को सत्ता से ही हटा दिया था। उस छात्र आंदोलन से नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) ने जन्म लिया। बांग्लादेश में तख़्तापलट के बाद कट्टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी अंतरिम सरकार के रूप में काम कर रही थी, जिसका नेतृत्व मोहम्मद युनूस कर रहे थे। 2024 में तख़्तापलट के बाद पहली बार आम चुनाव हुआ, जिसमें जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटीजन पार्टी का गठबंधन हुआ था। इनकी टक्कर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) से थी। चूंकि शेख हसीना की आवामी लीग के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी गई थी।

बीएनपी की एकतरफ़ा जीत
299 सीटों की इस लड़ाई में तारिक़ रहमान की बीएनपी ने जमात-ए-इस्लामी व नेशनल सिटीजन पार्टी की गठबंधन को बड़ा झटका देत हुए बड़ी जीत हासिल कर ली है। बीएनपी को जहां 212 सीटें मिलीं, वहीं जमात-ए-ईस्लामी को 75 और एनसीपी सिर्फ़ 6 सीटें ही जीत पाई। सबको याद होगा नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) वहीं पार्टी है, जिसने कुछ साल पहले अपने आंदोलन से आवामी लीग को सत्ता से बेदख़ल कर दिया था। उनके क्रांतिकारी रुख ने पूरे बांग्लादेश को आग में झोंक दिया था। उन्हें लगा, कि उनके ऐसा करने से वह जनता का दिल जीत लेंगे। मगर चुनाव का नतीजा देखकर उन्हें यह समझ आ गया होगा, कि जनता का दिल आप धर्म व जाति के नाम पर और डरा-धमकाकर नहीं जीत सकते।
कट्टर सोच का सफ़ाया
दूसरी तरफ़ जमात-ए-इस्लामी ने जबसे सत्ता संभाली, तबसे वहां कट्टर सोच ने जन्म ले लिया था, जिस तरह वहां अत्याचार हो रहे थे और हिंदुओं को मारा जा रहा था, इससे बांग्लादेश की छवि पूरी दुनिया में ख़राब हुई और पाकिस्तान से नज़दीकियां व भारत का विरोध उनपर भारी पड़ा और जनता ने उन्हें नक़ार दिया। बीएनपी के जीतने के बाद अब तय हो गया है, कि तारिक़ रहमान बांग्लादेश के अगले प्रधानमंत्री होंगे।

तारिक़ रहमान और बीएनपी का इतिहास
जमात-ए-इस्लामी और एनसीपी की टक्कर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) से थी, जिसका बांग्लादेश की सत्ता पर एक अलग इतिहास रहा है और इस चुनाव में वो इतिहास देश की जनता के सामने लौट आया जब तारिक़ रहमान बांग्लादेश की तीन बार प्रधानमंत्री रह चुकीं अपनी मां ख़ालिदा ज़िया के साथ देश वापस लौटे थे। उनके पिता ज़ियाउर रहमान वर्ष 1977 में बांग्लादेश के राष्ट्रपति पद के लिए चूने गए थे, वहीं ख़ालिदा ज़िया वर्ष 1991 से 1996 और वर्ष 2001 से 2006 तक और 1996 में कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री के पद पर रहीं थी। ख़ालिदा ज़िया का हाल ही में 30 नवंबर 2025 को निधन हो गया था, जहां उनके अंतिम दर्शन के लिए देश की जनता उमड़ पड़ी थी।
शेख हसीना की आवामी लीग
1996 में शेख हसीना के नेतृत्व में आवामी लीग सत्ता में आई थी। तबसे आवामी लीग और बीएनपी बांग्लादेश की दो सबसे बड़ी पार्टी और प्रतिद्वंदी रही हैं। शेख हसीना वर्ष 1996 से 2001 और 2009 से 2024 तक बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रह चुकी हैं। 2024 में छात्र आंदोलन के बाद उन्हें देश छोड़कर जाना पड़ा था और तब से वहां कट्टर जमात-ए-इस्लामी का राज था। तख़्तापलट के बाद से शेख हसीना भारत में ही रह रही हैं, जो बांग्लादेश और भारत के रिश्तों में आई खटास का कारण भी है।

क्या अब भारत से रिश्ते सुधरेंगे?
बीएनपी के आने से उम्मीद जताई जा रही है, कि बांग्लादेश और भारत के बीच के रिश्ते सुधरेंगे। बांग्लादेश की जनता 2024 से ही धर्म-जाति जैसी कट्टर सोच के बीच रह रही थी, जिसने पूरे देश में उथल-पुथल देखा है। चारों तरफ़ आग व आंदोलन को देखा है। हत्याएं देखी, बांटने वाली राजनीति देखी है। कह सकते हैं, कि जमाते-ए-इस्लामी का दौर एक ख़ौफ़नाक सपना था, जिसका अंत हो गया है। इस चुनाव से पता चलता है, कि बांग्लादेश की जनता ऐसे कट्टर पार्टियों से त्रस्त हो गई थी और उन्हें शांति की तलाश थी। इस आम चुनाव में जनता ने अपनी मंशा साफ़ कर दी है, कि क्रांतिकारी सोच से चुनाव नहीं जीत सकते।

बीएनपी की जीत पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फोन पर तारिक़ रहमान को बधाई दी है। इससे साफ़ होता है, कि भारत और बांग्लादेश के रिश्तों के लिए यह शुभ संदेश है। नरेंद्र मोदी ने कहा, कि ‘यह बांग्लादेश के लोगों के विश्वास की जीत है। इस जीत से हम अपने संबंधो में आए दरार को ख़त्म करेंगे। विकास से जुड़े हर क्षेत्र पर मिलकर काम करेंगे। उन्होंने कहा, कि दोनों देश का एक ही लक्ष्य होगा विकास और प्रगति’।
ख़ैर यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा, कि भारत और बांग्लादेश के रिश्तों की गाड़ी वापस पटरी पर दौड़ती है या नहीं। लेकिन एक बात तो स्पष्ट होता है, कि यह परिणाम बांग्लादेश में नये बदलाव के संकेत हैं।
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